रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी। जहां जहरीले सांप का नाम सुनते ही लोग रास्ता बदल लेते हैं और मगरमच्छ की आहट से पूरे गांव में दहशत फैल जाती है, वहीं दुधवा क्षेत्र की एक युवा बेटी ने अपने साहस और समर्पण से डर को भरोसे में बदल दिया है। महज 27 वर्ष की नाजरून निशा आज सीमावर्ती गांवों में सुरक्षा और राहत का पर्याय बन चुकी हैं।
बारिश का मौसम शुरू होते ही जंगलों से निकलकर सांप, अजगर और मगरमच्छ आबादी वाले इलाकों का रुख करने लगते हैं। ऐसे हालात में ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता अपने परिवार और पशुधन की सुरक्षा होती है। लेकिन अब जैसे ही किसी गांव में खतरनाक वन्यजीव दिखाई देता है, लोगों को भरोसा रहता है कि मदद जल्द पहुंच जाएगी।
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नाजरून निशा बिना किसी भय के ऐसे स्थानों पर पहुंचती हैं, जहां जाने से कई लोग कतराते हैं। उनकी सूझबूझ और प्रशिक्षण के कारण अब तक उनके द्वारा लगभग 400 सांपों के साथ अन्य वन्यजीवों को सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ा जा चुका है। खास बात यह है कि उनके प्रयासों से न केवल लोगों की जान बच रही है, बल्कि वन्यजीवों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो रहा है।
ग्रामीण बताते हैं कि पहले ऐसी घटनाओं में अफरा-तफरी मच जाती थी और कई बार लोग डर के कारण वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते थे। अब स्थिति बदल रही है। जागरूकता बढ़ी है और लोग सहायता के लिए सीधे संपर्क करते हैं।
नाजरून का मानना है कि इंसान और वन्यजीव दोनों प्रकृति का हिस्सा हैं। सही जानकारी और धैर्य से अधिकांश घटनाओं को बिना किसी नुकसान के संभाला जा सकता है। यही सोच उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
दुधवा क्षेत्र में उनका कार्य अब केवल रेस्क्यू तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह वन्यजीव संरक्षण और जनजागरूकता की मजबूत कड़ी बनकर उभरी हैं। सीमावर्ती गांवों में लोग उन्हें साहस, सेवा और समर्पण की मिसाल के रूप में देख रहे हैं।











