लखनऊ। यूपी की राजनीति में मायावती एक ऐसा नाम रही हैं जिसे कभी सत्ता का सबसे मजबूत केंद्र माना जाता था। दलित समाज की सबसे बुलंद आवाज, चार बार की मुख्यमंत्री और एक समय प्रधानमंत्री पद की दावेदार तक कही जाने वाली मायावती आज यूपी की राजनीति के हाशिये पर क्यों आ गई? यह सवाल अब न सिर्फ सियासी गलियारों में, बल्कि आम जनता के बीच भी गूंज रहा है। आइए जानते है कि क्या कारण रहा जो मायावती और बीएसपी को राजनीति के शीर्ष से धीरे-धीरे नीचे गिरा दिया।
बीएसपी सुप्रीमों मायावती के राजनीतिक नेतृत्व में सबसे बड़ी कमी यह रही कि उन्होंने जनता और मीडिया से दूरी बनाए रखी। जहां अन्य नेता जनसभाओं, रैलियों, टीवी डिबेट और सोशल मीडिया के जरिए जनता से निरंतर संवाद में रहे, वहीं बीएसपी सुप्रीमों मायावती एक ‘साइलेंट लीडर’ बनकर रह गईं। इससे उनका जनाधार धीरे-धीरे खिसकता चला गया।
बीएसपी की ताकत हमेशा उसका संगठन रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों में पार्टी में आंतरिक असंतोष, जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और टिकट वितरण में मनमानी जैसे कारणों से संगठन टूटता चला गया। पुराने और समर्पित नेता एक-एक कर पार्टी छोड़ते गए।
शिक्षा मित्रों का मानदेय बढ़ने के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कर दिया बड़ा ऐलान।।
2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधन करना बीएसपी सुप्रीमों मायावती के लिए आत्मघाती कदम साबित हुआ। चुनाव के बाद बीएसपी सुप्रीमों मायावती ने अखिलेश यादव पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए और गठबंधन तोड़ दिया। इससे न केवल वोट बैंक में भ्रम पैदा हुआ बल्कि दलित-पिछड़ा एकता का सपना भी टूट गया।
जहां बीएसपी सुप्रीमों मायावती ने दलित समाज को आवाज दी, वहीं अब भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नए युवा नेता दलित राजनीति में तेजी से उभरे है। ये नेता ज़मीनी मुद्दों पर सक्रिय हैं, सोशल मीडिया पर बेहद प्रभावी हैं और युवा वर्ग में लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। बीएसपी सुप्रीमों मायावती के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।
आज की राजनीति में सोशल मीडिया एक निर्णायक ताकत है। लेकिन बीएसपी मायावती और बसपा इस मोर्चे पर लगभग गायब रहे। उनकी डिजिटल उपस्थिति कमजोर रही और युवाओं तक उनका संदेश नहीं पहुंच सका। जबकि बीजेपी और अन्य पार्टियों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जबरदस्त पकड़ बनाई।
बीएसपी में मायावती के अलावा कोई दूसरा बड़ा चेहरा नहीं उभरा। उन्होंने उत्तराधिकार या पार्टी में दूसरे नेताओं को उभारने की कभी कोशिश नहीं की। इससे पार्टी की पूरी रणनीति और भविष्य सिर्फ एक व्यक्ति पर निर्भर हो गई जो राजनीति में खतरनाक होता है।
- 2012: सत्ता से बाहर
- 2014: लोकसभा में शून्य सीट
- 2017: विधानसभा में 19 सीटों पर सिमटी
- 2019: महागठबंधन के बावजूद मात्र 10 सीटें
- 2022: विधानसभा चुनाव में सिर्फ 1 सीट
यह आंकड़े खुद बयां करते हैं कि बीएसपी और मायावती का ग्राफ कैसे तेजी से नीचे गया।
एक साथ दर्जनों गिद्धों की मौत से हड़कंप, पर्यावरण के लिए बुरा संकेत।।













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