दो साथी शिक्षकों की दोस्ती ऐसी की धर्म अलग मगर साथ पढ़े, साथ नौकरी की और रिटायर होने के बाद आज भी कदम से कदम मिलाकर चलते है।
रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी। दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है, जिसमें न जाति की दीवार होती है और न धर्म की सीमा। सच्ची दोस्ती हो तो अलग-अलग मजहब और विचारधारा के लोग भी एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बन जाते हैं। निघासन विकासखंड के गांव झंडी में रहने वाले दो रिटायर शिक्षकों की दोस्ती इसकी जीवंत मिसाल है।
हम बात कर रहे हैं कामता प्रसाद दीक्षित और सैय्यद हाजी काजिम हुसैन की। दोनों अलग-अलग धर्मों से हैं, लेकिन एक-दूसरे के धर्म और आस्था का पूरा सम्मान करते हैं। वर्षों पुरानी इनकी दोस्ती आज भी उसी मजबूती के साथ कायम है, जिस तरह नौकरी के दिनों में थी।
साथ पढ़ाई से शुरू हुआ सफर
कामता प्रसाद दीक्षित और काजिम हुसैन ने एक साथ पढ़ाई शुरू की थी। पढ़ाई के दौरान दोनों की दोस्ती हुई और समय के साथ यह दोस्ती गहरी होती चली गई। पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों ने बेसिक शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक के रूप में नौकरी शुरू की। खास बात यह रही कि शिक्षा के क्षेत्र में भी दोनों साथ-साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहे।
काजिम हुसैन वर्ष 1997 में सेवानिवृत्त हुए, जबकि उनके मित्र कामता प्रसाद दीक्षित ने 1998 में नौकरी से सेवानिवृत्ति ली। नौकरी से विदाई के बाद भी दोनों की दोस्ती में कोई बदलाव नहीं आया।
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एक बने हाजी, दूसरे कहलाए बाबा
सेवानिवृत्ति के बाद दोनों मित्रों के जीवन में आध्यात्मिकता का रंग और गहरा हुआ, लेकिन दोनों की अपनी-अपनी आस्था के अनुरूप।
काजिम हुसैन हज यात्रा पर गए। हज से लौटने के बाद लोग उन्हें सम्मान से हाजी साहब कहने लगे। वहीं कामता प्रसाद दीक्षित मां काली की भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने लाल वस्त्र धारण कर मां काली की पूजा-अर्चना शुरू की, जिसके बाद ग्रामीण उन्हें स्नेह और सम्मान से बाबा जी कहने लगे।
एक तरफ हाजी साहब हैं तो दूसरी तरफ बाबा जी, लेकिन दोनों की दोस्ती में धर्म कभी दीवार नहीं बना।
सभी धर्मों का करते हैं सम्मान
दोनों मित्र आज भी गृहस्थ जीवन में रहते हुए सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। गांव में हर वर्ग और हर समुदाय के लोगों के साथ उनका आत्मीय व्यवहार है। दोनों सभी धर्मों और जातियों के लोगों का सम्मान करते हैं और सामाजिक आयोजनों में भी एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई देते हैं।
इन दोनों की दोस्ती उस संदेश को मजबूत करती है कि इंसान की पहचान उसके धर्म से पहले उसके व्यवहार और इंसानियत से होती है। गांव के लोग भी दोनों मित्रों के आपसी प्रेम, सम्मान और भाईचारे की सराहना करते हैं।
साथ पढ़ाई से शुरू हुई दोस्ती, साथ नौकरी तक पहुंची और अब उम्र के इस पड़ाव पर भी कायम है। यही वजह है कि झंडी गांव के ये दोनों मित्र आज सिर्फ एक-दूसरे के दोस्त नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द की एक खूबसूरत मिसाल बन चुके हैं।
















