लखीमपुर लखनऊ अलीगढ वाराणसी आगरा आजमगढ़ इटावा एटा उन्नाव कनौज कानपूर कासगंज गोरखपुर गाजीपुर कुशीनगर कौशांबी गाज़ियाबाद गौतमबुद्ध नगर चंदौली चित्रकूट जालौन जौनपुर झाँसी देवरिया पीलीभीत प्रतापगढ़ प्रयागराज फतेहपुर फर्रुखाबाद फिरोजाबाद फैजाबाद बदायूँ बरेली बलरामपुर बलिया बस्ती बहराइच बाँदा बारांबकी बिजनौर बुलंदशहर भदोही मऊ मथुरा महाराजगंज महोबा मिर्ज़ापुर मुजफ्फरनगर मुरादाबाद मेरठ मैनपुरी रामपुर रायबरेली ललितपुर शाहजहांपुर श्रावस्ती संत कबीर नगर संत रविदास नगर संभल सहारनपुर सिद्धार्थनगर सीतापुर सुल्तानपुर सोनभद्र हमीरपुर हरदोई हाथरस अन्य
Latest news

विज्ञापन

85 वर्ष की चमेला देवी की जिंदगी में सरकारी योजनाओं की रोशनी अब तक नहीं पहुंची, जिम्मेदार कौन?

By: दीप मिश्रा संपादक

On: Sunday, August 9, 2026 9:15 AM

Google News
Follow Us

रिपोर्ट:- शरद मिश्रा (प्रतिभा टाइम्स)
लखीमपुर खीरी। सरकार गरीब, बेसहारा और बुजुर्गों के लिए तमाम कल्याणकारी योजनाएं संचालित कर रही है। जरूरतमंदों को पक्का मकान, वृद्धावस्था पेंशन और आर्थिक सहायता देने के दावे भी किए जाते हैं। लेकिन निघासन ब्लॉक के लोखंदरपुर गांव की करीब 85 वर्षीय चमेला देवी की जिंदगी इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती नजर आती है।
चमेला देवी का एक बेटा था, लेकिन बीमारी के चलते उसकी मौत हो गई। बेटे के चले जाने के बाद बुजुर्ग महिला के जीवन का सहारा भी छिन गया। अब वह गांव में बनी एक छोटी सी कुटिया में अकेले जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। उम्र के इस पड़ाव पर जहां उन्हें अपनों और सरकारी मदद के सहारे की जरूरत है, वहीं उनकी जिंदगी किसी तरह गुजर-बसर करने तक सीमित रह गई है।

न आवास, न पेंशन… आखिर किसके लिए हैं सरकारी योजनाएं?

चमेला देवी के मुताबिक उन्हें अब तक सरकारी आवास का लाभ नहीं मिला है। इतना ही नहीं, वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजना का लाभ भी उन्हें नहीं मिल पा रहा है। विधवा पेंशन भी उन्हें नहीं मिलती। ऐसे में सवाल यह है कि यदि करीब 85 वर्ष की एक अकेली और बेसहारा महिला सरकारी योजनाओं की पात्रता के बावजूद उनके लाभ से वंचित है, तो फिर योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक कैसे पहुंच रहा है?

कुटिया में कट रही जिंदगी, आंखों में सिर्फ एक उम्मीद

प्रतिभा टाइम्स की टीम जब सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत जानने के लिए लोखंदरपुर गांव पहुंची तो चमेला देवी की स्थिति सामने आई। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह किसी तरह अपना गुजारा कर रही हैं। उनके पास न कोई मजबूत पारिवारिक सहारा है और न ही ऐसी नियमित आर्थिक सहायता, जिससे वह अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकें।
चमेला देवी की आंखों में अब कोई बड़ी ख्वाहिश नहीं है। उनकी बस एक ही इच्छा है कि उनकी वृद्धावस्था पेंशन बन जाए, ताकि जीवन के बचे हुए दिन किसी के सामने हाथ फैलाए बिना गुजारे जा सकें।

आरआरसी सेंटर बनाकर भूल गया सिस्टम, लाखों की लागत के बाद भी कूड़ा प्रबंधन बेपटरी।।

जिम्मेदारों से बड़ा सवाल

सरकार लगातार अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने की बात करती है। लेकिन चमेला देवी जैसे मामले यह सवाल खड़ा करते हैं कि सरकारी योजनाओं का सर्वे और पात्र लाभार्थियों का चयन आखिर किस स्तर पर हो रहा है?
क्या गांवों में पात्र बुजुर्गों की वास्तविक स्थिति की जांच की जा रही है? क्या जिम्मेदार अधिकारी ऐसे लोगों तक स्वयं पहुंचकर उनकी समस्याओं का समाधान कर रहे हैं? या फिर योजनाओं का लाभ लेने के लिए बुजुर्ग और बेसहारा लोगों को ही सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं?
चमेला देवी की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मजबूरी नहीं, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था के लिए आईना है, जिसके कागजों में योजनाएं गरीबों तक पहुंच रही हैं, लेकिन जमीन पर कई जरूरतमंद आज भी इंतजार कर रहे हैं।

बहुमत से शून्य तक: उमाशंकर सिंह के निधन के साथ यूपी विधानसभा में BSP का अस्तित्व हुआ खत्म।।

विज्ञापन

For Feedback - pratibhatimes1@gmail.com

Join WhatsApp

Join Now

Join you tube

Subscribe

Related News

August 9, 2026

August 7, 2026

August 7, 2026

August 6, 2026

August 6, 2026

August 6, 2026

Leave a Comment