रिपोर्ट:- शरद मिश्रा (प्रतिभा टाइम्स)
लखीमपुर खीरी। स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांवों को साफ-सुथरा बनाने और ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत करने के लिए सरकार की ओर से ग्राम पंचायतों में लाखों रुपये खर्च किए गए। आरआरसी से लेकर शोखपीट और कूड़ा उठाने वाले वाहनों तक की व्यवस्था के लिए सरकारी धन खर्च हुआ, लेकिन निघासन विकासखंड की ग्राम पंचायत मदनापुर सहित कई ग्राम पंचायतों में इन योजनाओं की जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई ग्राम पंचायतों में लाखों रुपये की लागत से आरआरसी सेंटर का निर्माण तो करा दिया गया, लेकिन निर्माण के बाद इनका नियमित संचालन नहीं हो रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि जिस उद्देश्य से इन केंद्रों का निर्माण कराया गया, वह उद्देश्य आखिर कब पूरा होगा?
स्वच्छता व्यवस्था के तहत ग्राम पंचायतों में बनाए गए शोखपीट भी कई स्थानों पर महज निर्माण तक सीमित दिखाई दे रहे हैं। इनका वास्तविक उपयोग हो रहा है या नहीं, इसकी निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी परिसंपत्तियां उपयोग में नहीं आ रही हैं तो सरकारी धन के वास्तविक लाभ को लेकर जवाबदेही तय होना जरूरी है।
ग्राम पंचायतों में घर-घर से कूड़ा एकत्र करने और उसे निर्धारित स्थान तक पहुंचाने के लिए कूड़ा उठाने वाले वाहनों की खरीद भी की गई। बताया जाता है कि कई पंचायतों में इन वाहनों की खरीद पर करीब डेढ़ लाख रुपये तक खर्च किए गए। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इन वाहनों की नियमित मौजूदगी और संचालन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ स्थानों पर कूड़ा उठाने के लिए खरीदे गए वाहनों का इस्तेमाल कथित तौर पर अन्य कार्यों में किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। यदि ऐसा है तो इसकी निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि सरकारी धन से खरीदे गए वाहनों का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुसार ही हो रहा है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार ने जिस योजना के जरिए गांवों में कचरा प्रबंधन और स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए, उसका लाभ ग्रामीणों को कितना मिल रहा है?
आरआरसी सेंटरों का निर्माण, शोखपीट की स्थापना और कूड़ा उठाने वाले वाहनों की खरीद—इन सभी पर सरकारी धन खर्च होने के बावजूद यदि इनका प्रभावी इस्तेमाल नहीं हो रहा है तो यह केवल व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि सरकारी धन के उपयोग और निगरानी की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों की मांग है कि निघासन विकासखंड की ग्राम पंचायतों में स्वच्छ भारत मिशन के तहत कराए गए कार्यों का भौतिक सत्यापन कराया जाए। आरआरसी सेंटरों की स्थिति, शोखपीट के उपयोग, खरीदे गए वाहनों की उपलब्धता और उनके संचालन की जांच के साथ-साथ खर्च की गई धनराशि का भी ऑडिट कराया जाए।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इन शिकायतों और सवालों का संज्ञान लेते हैं या फिर लाखों रुपये खर्च कर बनाई गई ये व्यवस्थाएं इसी तरह कागजों और बंद पड़े परिसरों तक सीमित रहती हैं। इस मामले में बीडीओ निघासन जयेश कुमार सिंह ने बताया कि मामले की जांच कराकर जिन पंचायतों में आरआरसी सेंटर शुरू नहीं उनके खिलाफ उचित कार्यवाही की जाएगी।
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