रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी। स्वच्छता को लेकर बड़े-बड़े दावे, हाथों में झाड़ू और कैमरों के सामने मुस्कुराते चेहरे… तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल होती हैं, लेकिन इन तस्वीरों के पीछे की जमीनी हकीकत कई जगह कुछ और ही कहानी बयां करती नजर आती है। स्वच्छता अभियान का उद्देश्य लोगों को साफ-सफाई के प्रति जागरूक करना था, मगर कई स्थानों पर यह अभियान महज फोटो सेशन तक सीमित होता दिखाई दे रहा है।
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नेता हों या अधिकारी, विशेष अवसरों पर हाथ में झाड़ू लेकर सफाई करते हुए तस्वीरें खिंचवाने और उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करने की होड़ नजर आती है। कुछ देर की इस औपचारिक सफाई के बाद कैमरे हटते ही व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाती है। नतीजा यह है कि जिन स्थानों पर नियमित सफाई की जरूरत है, वहां कूड़े के ढेर, नालियों में जमा गंदगी और जगह-जगह बिखरा कचरा लोगों की परेशानी बढ़ा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल उन जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर उठता है, जिनके जिम्मे नियमित साफ-सफाई का दायित्व है। यदि अभियान के दौरान झाड़ू चलाने के बाद भी सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी बनी रहती है तो केवल फोटो खिंचवाने से स्वच्छता का लक्ष्य कैसे पूरा होगा? लोगों का कहना है कि स्वच्छता सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि रोजाना की जिम्मेदारी है।
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स्वच्छता अभियान की सफलता सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों से नहीं, बल्कि साफ सड़कों, स्वच्छ गलियों, कूड़ा मुक्त सार्वजनिक स्थानों और नियमित साफ होती नालियों से दिखाई देनी चाहिए। जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार अधिकारी फोटो सेशन से आगे बढ़कर नियमित निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करें।
झाड़ू हाथ में लेकर तस्वीर खिंचवाना आसान है, लेकिन सफाई व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाए रखना असली चुनौती है। स्वच्छता अभियान तभी सार्थक होगा, जब कैमरे के सामने नहीं बल्कि धरातल पर बदलाव दिखाई देगा।
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