सोनीपत (हरियाणा)। आधुनिक दौर की भागदौड़ और बदलते फैमिली रिश्तों के बीच हरियाणा के सोनीपत से सामने आई एक घटना ने इंसानियत और फैमिली मूल्यों पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जिस बाप ने अपनी पुत्रियों को पढ़ाया-लिखाया, उन्हें आत्मनिर्भर और सफल बनाया, उसी पिता की अंतिम घड़ियों में उसके अपने साथ नहीं थे।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वृद्धाश्रम में रह रहे शिवचरण रत्न गुप्ता पिछले कई दिनों से बीमार थे। वृद्धाश्रम के संचालक आनंद के अनुसार, उनकी तबीयत बिगड़ने की सूचना लगभग 20 दिन पहले उनकी तीनों बेटियों अनिता, निशा और प्रिया को दी गई थी। उम्मीद थी कि बेटियां पिता के पास पहुंचेंगी, उनका हाथ थामेंगी और उन्हें यह एहसास दिलाएंगी कि वे अकेले नहीं हैं। लेकिन हर बार कोई न कोई मजबूरी सामने आ गई और कोई भी बेटी उनसे मिलने नहीं पहुंची।
बताया जाता है कि शिवचरण गुप्ता रोज़ अपने पास रखे मोबाइल फोन से बेटियों से बात किया करते थे। बीमारी बढ़ने के बाद धीरे-धीरे फोन भी आने बंद हो गए। शायद वे आखिरी बार अपनी बेटियों की आवाज़ सुनना चाहते थे, लेकिन यह इच्छा भी अधूरी रह गई।
समय ने करवट ली और शिवचरण गुप्ता ने वृद्धाश्रम में ही अंतिम सांस ली। निधन की सूचना मिलने पर भी तीनों बेटियां अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुंचीं। बड़ी बेटी नेपाल में शिक्षिका है, दूसरी उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में रहती है और सबसे छोटी बेटी मुंबई में रहती है। दूरी थी, लेकिन उससे कहीं बड़ी दूरी रिश्तों में आ चुकी थी।
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बताया गया कि पिता का अंतिम संस्कार बेटियों ने केवल वीडियो कॉल के माध्यम से देखा। बड़ी बेटी ने ऑनलाइन इक्कावन सौ रुपए भेजते हुए अंतिम संस्कार विधिवत कराने की बात कही। पहले अस्थियां सुरक्षित रखने को कहा गया, लेकिन बाद में समयाभाव का हवाला देकर वृद्धाश्रम के संचालक से ही गंगा में विसर्जन कराने का अनुरोध कर दिया। इतना ही नहीं, अंतिम संस्कार की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग भी उन्हें भेजने के लिए कहा गया।
यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलते समाज का आईना है, जहां भौतिक सफलता तो बढ़ रही है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे ठंडी पड़ती जा रही है। सवाल यह नहीं कि बेटियां कितनी सफल हुईं, बल्कि यह है कि क्या कोई भी सफलता उस पिता के कंधे का विकल्प बन सकती है, जिसने पूरी जिंदगी अपने बच्चों के लिए संघर्ष किया?
समाज के लिए संदेश
माता-पिता को सबसे अधिक धन, उपहार या सुविधाओं की नहीं, बल्कि अपने बच्चों के समय, सम्मान और स्नेह की आवश्यकता होती है। जीवन की व्यस्तता कभी इतनी बड़ी नहीं होनी चाहिए कि जन्म देने वाले माता-पिता की अंतिम इच्छा भी अधूरी रह जाए।
हर व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए कि धन, पद और प्रतिष्ठा फिर से कमाई जा सकती है, लेकिन माता-पिता के साथ बिताने का समय कभी लौटकर नहीं आता। उनकी मौजूदगी ही सबसे बड़ी पूंजी है। उनके रहते उनका सम्मान करें, क्योंकि एक दिन केवल तस्वीरें, यादें और पछतावा ही शेष रह जाते हैं।











