रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होते ही निजी स्कूलों की मनमानी एक बार फिर चर्चा में है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन अपने स्तर पर किताबों और कोर्स की सूची तय कर देता है और फिर उन्हीं से जुड़ी चुनिंदा दुकानों से सामग्री खरीदने का दबाव बनाया जाता है। इससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता और उन्हें मजबूरी में महंगी किताबें खरीदनी पड़ती हैं।
अभिभावकों का कहना है कि जिन किताबों की कीमत सामान्यतः 70 से 80 रुपये होनी चाहिए, वही किताबें 200 से 300 रुपये तक बेची जा रही हैं। आरोप है कि स्कूल और दुकानदारों के बीच कमीशन तय रहता है, जिसकी वजह से किताबों की कीमतें बढ़ा दी जाती हैं। इससे अभिभावकों की जेब पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
सबसे बड़ी चिंता का विषय यह भी है कि पहले के समय एक बार कोर्स खरीद लेने के बाद कई वर्षों तक छोटे भाई-बहन या अन्य बच्चों द्वारा वही किताबें उपयोग में लाई जाती थीं, जिससे खर्च कम हो जाता था। लेकिन अब अधिकतर निजी स्कूल हर वर्ष कोर्स में बदलाव कर देते हैं, जिससे पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं और अभिभावकों को हर साल नया कोर्स खरीदना पड़ता है।
अभिभावकों में इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह की व्यावसायिक प्रवृत्ति उचित नहीं है और इस पर नियंत्रण होना चाहिए। कई अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि स्कूलों द्वारा तय दुकानों से किताबें खरीदने की बाध्यता समाप्त कराई जाए और किताबों के दामों की जांच कर उचित कार्रवाई की जाए, ताकि अभिभावकों को राहत मिल सके।
शिक्षा को सेवा का माध्यम माना जाता है, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह व्यवस्था अभिभावकों के लिए आर्थिक परेशानी का कारण बनती जा रही है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस समस्या पर क्या कदम उठाते हैं।
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