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मृत्यु एक निरपेक्ष सत्य फिर भय क्यों? :- रुद्र प्रताप सिंह, पूर्व आईएएस

By: दीप मिश्रा संपादक

On: Sunday, October 4, 2026 5:41 PM

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लेखक:- रुद्रप्रताप सिंह पूर्व आईएएस

👉आइए आज मृत्यु जो एक निरपेक्ष सत्य है उसके बारे में बात करते हैं और कुछ विद्वानों और दार्शनिकों के सुझाव भी आपके सामने रखते हुए अपना सुझाव भी देता हूं। ना जन्म हमारे बस में है और न मृत्यु। जन्म लेते समय हमको मालूम नहीं ,लेकिन मृत्यु के बारे में तो हर व्यक्ति को मालूम मेरे को एक दिन आएगी इसीलिए इसको निरपेक्ष सत्य कहते हैं और यही अकेला सत्य है।
डर मृत्यु का नहीं है। डर इस बात का है कि मृत्यु अभी आएगी, और उसके आने का ढंग हमारे बस में नहीं होगा। सत्य जान लेने से डर नहीं मिटता। आदमी आग को भी जानता है, फिर भी हाथ नहीं डालता। मृत्यु वही आग है, बस बुझाने वाला कोई नहीं।

सत्य और डर एक साथ क्यों रहते है

आदमी कहता है, मरना पक्का है। फिर भी रात को छाती धड़कती है। यह विरोधाभास मूर्खता नहीं है। ज्ञान और भाव दो अलग अदालतें हैं। ज्ञान कहता है, हर जन्मा मरेगा। भाव कहता है, यह शरीर अभी मेरा है, इसे अभी मत ले जाओ। पहली अदालत का फैसला सार्वभौमिक है। दूसरी अदालत का मुकदमा निजी है। डर इसी दरार में पलता है।
दर्शन इसे यूँ पढ़ता है। मृत्यु एक घटना है, पर जीवित आदमी के लिए वह घटना कभी अनुभव नहीं बनती। एपिक्यूरस का वाक्य कठोर और साफ है: जहाँ मैं हूँ, वहाँ मृत्यु नहीं। जहाँ मृत्यु है, वहाँ मैं नहीं। इसलिए मृत्यु मुझसे कुछ छीनती नहीं, क्योंकि छीनने के समय मैं बचता ही नहीं। तर्क पूरा है। फिर भी आदमी नहीं मानता। कारण यह है कि वह मृत्यु को घटना नहीं, हानि मानता है। हानि का लेखा जीवित रहते हुए ही बन जाता है। कल का कार्यक्रम कट जाएगा। बेटा बिना सहारे रह जाएगा। जो बात कही नहीं गई, वह अनकही रह जाएगी। डर भविष्य की इस काल्पनिक हानि का है, शव का नहीं।

तीन डर, एक नाम

एक शब्द में तीन चीजें घुल जाती हैं।

पहली चीज शरीर की है। साँस अटकना, दिल दौड़ना, हाथ ठंडे होना। यह विचार नहीं, यंत्र है। हर जीव में लगा है, ताकि वह कल तक बचे। जो इस यंत्र को पूरी तरह काट दे, वह अक्सर बहादुर नहीं, बीमार होता है। डर का यह हिस्सा मिटाने की चीज नहीं। पहचानने की चीज है।
दूसरी चीज अधूरे हिसाब की है। कर्जा, बिना कही बात, छोटा बच्चा, बिखरा कागज़। जिसका लेखा बैठ चुका हो, उसकी रात हल्की होती है। जिसका लेखा बिखरा हो, वह स्वस्थ होकर भी मरने से डरता है। यहाँ मृत्यु बड़े रूप में इसलिए आती है कि जीवन छोटा और अधूरा छोड़ दिया गया था।
तीसरी चीज अज्ञात की है। मरने के बाद क्या है, यह कोई लौटकर नहीं बताता। धर्म नक्शा देता है। विज्ञान चुप रहता है। बीच का आदमी गलियारे में खड़ा रह जाता है। बहुत बार डर मौत का नहीं, इस गलियारे का होता है। और दर्द का। बेड इसलिए डरावना लगता है कि वहाँ मृत्यु धीमी है। नली लगी है। बोलना नहीं आता। फैसला दूसरे कर रहे हैं। चलते-फिरते मरना इसलिए अच्छा लगता है कि उसमें इंतज़ार नहीं।

चलते मरना और लेटे मरना

यह भेद जगह का नहीं, संबंध का है। कुछ लोग गली में गिरते हैं और अकेले पड़े रहते हैं। कुछ बिस्तर पर हाथ थामे जाते हैं। अचानक मृत्यु दया भी हो सकती है और निर्वासन भी। लंबी बीमारी यातना भी हो सकती है और विदा भी। रोमांटिक निष्कर्ष यहाँ गलत होगा।
फिर भी एक विश्लेषण टिकता है। जो आदमी अंतिम वर्ष तक अपने पाँव पर है, वह मृत्यु को मेहमान की तरह देख पाता है। जो वर्षों से बिस्तर से बँधा है, वह मृत्यु को मालिक की तरह देखता है। मेहमान से बात होती है। मालिक से अर्ज़ी होती है। डर इसी अर्ज़ी में बढ़ता है। चलते-फिरते मरना भाग्य भी है, आदत भी। गारंटी किसी शास्त्र के पास नहीं। संभावना शरीर की दिनचर्या में छिपी है।

दर्शन क्या कह चुका है

गीता मृत्यु को आश्चर्य मानने से मना करती है। जन्मे की मृत्यु ध्रुव है, मरे हुए का जन्म ध्रुव है, इसलिए जो अपरिहार्य है उस पर शोक ज्ञान के विरुद्ध है। यहाँ सांत्वना नहीं, अनुशासन है। शोक रुकता नहीं। शोक को अंतिम सत्य मानना रुकता है।
बुद्ध पकड़ पर हाथ रखते हैं। जो अपना कहा जा रहा है, वह अपना रह नहीं सकता। रूप, वेदना, ओहदा, कल का कार्यक्रम। डर वहीं जन्म लेता है जहाँ अनित्य को नित्य मान लिया गया हो। निर्वाण की भाषा कठिन है। रोजमर्रा का अर्थ सरल है। जो चीज जाने वाली है, उसका उपयोग करो, मालिक मत बनो।
स्टोइक आदमी को दो घेरों में बाँटते हैं। एक घेरा बस में है: चाल, वचन, आज का काम। दूसरा बस से बाहर है: आयु, दुर्घटना, बीमारी की घड़ी। डर ज्यादातर दूसरे घेरे में घुसकर पहला घेरा भी खराब कर देता है। सेनेका लिखता है कि हम मृत्यु से नहीं, मृत्यु की तैयारी न होने से काँपते हैं। तैयारी यहाँ वसीयत भी है और स्वभाव भी।
हाइडेगर आधुनिक भाषा में कहता है कि आदमी अपनी मृत्यु को आम सांख्यिकी बनाकर टालता है। सब मरेंगे, इसलिए मैं अभी नहीं। यह टालमटोल ही डर को भूमिगत कर देती है। जो अपनी मृत्यु को अपनी संभावना मानकर जीता है, उसकी दिनचर्या बदलती है। काम छोटे नहीं होते। काम चुने हुए होते हैं।
तीनों परंपराएँ एक चौराहे पर मिलती हैं। डर वस्तु का नहीं, स्वामित्व का है। शरीर, नाम, आने वाला कल। इनका उपयोग करते रहो। इनके मालिक बनते ही मृत्यु चोर लगने लगती है।

ना डरने का कार्यक्रम नारा नहीं

पूरी निर्भयता की माँग अक्सर सुन्नपन की माँग होती है। काफी इतना है कि डर आए, पहचाना जाए, और पाँव फिर भी आगे बढ़ें। इसके लिए चार काम विश्लेषण से निकलते हैं।
शरीर को इतना मत छोड़िए कि वह आपसे पहले हार जाए। रोज चलना, पेट हल्का रखना, नींद का समय, तंबाकू और बेहिसाब दारू से दूरी। यह अमरत्व नहीं है। यह इस बात की कोशिश है कि मृत्यु जब आए तो पाँव अभी काम कर रहे हों। हृदयाघात और साँस का अचानक बंद होना भाग्य भी है। पर बहुत सी गिरावट उन आदतों से टलती है जिन्हें आदमी “होने ही वाला है” कहकर टाल देता है।
हिसाब निपटा कर रखिए। देना है तो लिख दीजिए। कहना है तो इस महीने कह दीजिए। घर का कागज़ एक लिफाफे में हो, ताकि मरने के बाद बच्चे दफ्तर का चक्कर न काटें। अधूरा काम मृत्यु को बड़ा बनाता है। बैठा हुआ काम उसे सामान्य कर देता है।
मृत्यु को रोज एक बार पास बैठाइए, घंटों नहीं। आज कौन-सा काम मरते समय शर्मिंदगी देगा। कौन-सा काम कल भी टल सकता है। यह अभ्यास डर मिटाता नहीं। उसे पहचानने योग्य बनाता है। पहचाना हुआ डर रात में कम दौड़ता है।
अंतिम समय का अधिकार अपने पास रखिए। घर वालों से साफ कह दीजिए कि बेवजह नली और मशीन नहीं, साथ चाहिए। जहाँ कानून माने, यह लिखवा कर रखना मृत्यु से नहीं बचाता। असहाय पड़े रहने से बचाता है। अस्पताल बुरा नहीं है। बुरा है वह कमरा जहाँ आदमी बोल नहीं सकता और फैसला उसके बिना हो रहा है।

आखिरी भेद

ओल्ड डर और नई समझ में एक रेखा है। डर आए, यह शरीर है। डर को जीवन का स्वामी बना लेना, यह आदत है। पहली चीज जीवित रहने का यंत्र है। दूसरी चीज अधूरे हिसाब और अनित्य को नित्य मान लेने का फल है।
जो आदमी अंतिम दिन तक चलता है, अपना लेखा बैठा चुका होता है, और बिस्तर पर भी हाथ थामने वाला कोई उसका होता है, वह मृत्यु से युद्ध नहीं करता। वह केवल यह देखता है कि साँस अब छोटी हो रही है। देखना और डरना एक बात नहीं। दर्शन की सारी मेहनत इसी भेद को बचाने में जाती है।

लेखक:: रुद्र प्रताप सिंह आईएएस retd

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