रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी: शारदा नदी की बाढ़ ने तराई के किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। खेतों में खड़ी धान और गन्ने की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है। कई गांवों में 60 से 70 फीसदी तक फसलें प्रभावित होने का दावा किया जा रहा है। इसके बावजूद फसल मुआवजे के नाम पर किसानों के खातों में महज दो-दो हजार रुपये पहुंचने से उनकी चिंता बढ़ गई है। किसानों का कहना है कि फसल बर्बाद होने से पहले ही आर्थिक संकट गहरा गया था, अब मुआवजे की रकम से नुकसान की भरपाई करना मुश्किल है। वहीं, कई किसान अब भी सहायता मिलने का इंतजार कर रहे हैं।निघासन क्षेत्र की लुधौरी और बैलहा,बरोठा पंचायतों समेत कई गांव बाढ़ के पानी से प्रभावित हुए थे। पानी भरने से खेतों में खड़ी फसलें डूब गईं। ग्रामीणों के मुताबिक, लुधौरी पंचायत के कई गांवों में करीब 70 फीसदी तक फसलें बर्बादी की कगार पर हैं। खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहने से फसलों को नुकसान लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद मुआवजे की रकम किसानों को नाकाफी लग रही है।
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सेमरापुरवा के किसान राजकुमार और नरपे सिंह तथा पुरैना के रामचंद्र,सहजराम, ने बताया कि अभी भी खेतों में पानी भरा हुआ है। गन्ने की फसल नीचे से सड़ रही है, जबकि धान की फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। किसानों का कहना है कि फसल तैयार करने में बीज, खाद, दवा और मजदूरी पर काफी खर्च हुआ था। अब फसल हाथ से निकलने के बाद अगली खेती की तैयारी और परिवार की जरूरतें पूरी करना भी चुनौती बन गया है।
किसानों के मुताबिक, कुछ लोगों के खातों में दो-दो हजार रुपये की सहायता राशि पहुंची है, जबकि बड़ी संख्या में किसान अब भी मुआवजे से वंचित हैं। किसानों का कहना है कि नुकसान का आकलन और मुआवजे की राशि उनकी वास्तविक क्षति के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि बाढ़ की मार झेल रहे परिवारों को राहत मिल सके। खेतों में भरे पानी के बीच सड़ती फसलों को देखकर किसान अब नुकसान की भरपाई और अगली फसल की तैयारी को लेकर चिंतित हैं।

















