लखनऊ। यूपी की राजनीति में कभी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने वाली BSP आज ऐसे दौर में पहुंच गई है, जहां विधानसभा में उसका एक भी MLA नहीं बचा। जनपद बलिया की विधानसभा रसड़ा सीट से विधायक और BSP के इकलौते विधानसभा सदस्य उमाशंकर सिंह के निधन के बाद पार्टी की विधानसभा में मौजूदगी पूरी तरह समाप्त हो गई है। यह घटना केवल एक सीट के खाली होने की नहीं, बल्कि BSP की लगातार कमजोर होती राजनीतिक पकड़ की कहानी भी बयां करती है।
BSP की नींव 1984 में समाज के वंचित, दलित और पिछड़े वर्गों को राजनीतिक ताकत देने के उद्देश्य से रखी गई थी। संस्थापक कांशीराम ने “बहुजन” की अवधारणा को जन-जन तक पहुंचाया और इसी आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए मायावती ने यूपी की राजनीति में नया इतिहास रचा। 2007 में BSP ने “सर्वजन” सामाजिक समीकरण के दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं। उस दौर में BSP को प्रदेश की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकतों में गिना जाता था।
लेकिन समय के साथ पार्टी का जनाधार लगातार सिमटता गया। 2012 में सत्ता हाथ से निकली, 2017 के विधानसभा चुनाव में BSP केवल 19 सीटों पर सिमट गई और 2022 में उसका प्रदर्शन और भी कमजोर रहा। पूरे प्रदेश में पार्टी सिर्फ एक सीट बलिया की रसड़ा ही बचा सकी, जहां से उमाशंकर सिंह ने जीत दर्ज की थी।
उमाशंकर सिंह लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे। बुधवार देर शाम उनके निधन के साथ ही विधानसभा में BSP की आखिरी आवाज भी खामोश हो गई। अब उत्तर प्रदेश विधानसभा में BSP का कोई विधायक नहीं है। यह स्थिति उस दल के लिए बड़ा राजनीतिक झटका मानी जा रही है, जिसने कभी प्रदेश की सत्ता पर अकेले दम पर कब्जा किया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बदलते सामाजिक समीकरण, लगातार घटता जनाधार, संगठनात्मक कमजोरी और नए राजनीतिक विकल्पों के उभरने से BSP की स्थिति लगातार कमजोर हुई है। कभी दलित राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा रही पार्टी आज अपने अस्तित्व को फिर से मजबूत करने की चुनौती से जूझ रही है।
यूपी की राजनीति में BSP का यह सफर सत्ता के शिखर से विधानसभा में शून्य तक पहुंचने की कहानी बन गया है। आने वाले समय में पार्टी इस चुनौती से कैसे उबरती है, इस पर पूरे प्रदेश की राजनीतिक निगाहें टिकी रहेंगी।
आंगनबाड़ी, आशा बहुओं व रसोइयों का बढ़ेगा मानदेय, सीएम योगी आदित्यनाथ ने कही ये बात।।











