लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को लेकर एक अहम प्रशासनिक निर्णय लिया है। जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पहली बार उन्हें ही प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी सौंपने का आदेश जारी किया गया है। इसके साथ ही प्रदेश के सभी जिला पंचायतों में विकास कार्यों की निरंतरता बनाए रखने की कोशिश की गई है। सरकार अब इसी तर्ज पर ब्लॉक प्रमुखों को भी प्रशासक बनाए जाने की तैयारी कर रही है।
पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बताया कि जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल 11 जुलाई को समाप्त हो रहा था। ऐसे में नई व्यवस्था लागू होने तक प्रशासनिक शून्यता न रहे, इसलिए वर्तमान अध्यक्षों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई है। उनके अनुसार पंचायत चुनाव संपन्न होने तक यह व्यवस्था प्रभावी रहेगी।
आईएएस सुधा वर्मा बनीं उत्तर प्रदेश की नई श्रमायुक्त, प्रशासनिक फेरबदल में मिली अहम जिम्मेदारी।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे जिला पंचायत अध्यक्ष बड़े नीतिगत या वित्तीय निर्णय नहीं ले सकेंगे। हालांकि पहले से स्वीकृत विकास योजनाओं का संचालन, नियमित प्रशासनिक कार्य और आवश्यक भुगतान जैसी प्रक्रियाएं पूर्ववत जारी रहेंगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य प्रभावित न हों।
राजनीतिक दृष्टि से भी इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रदेश की अधिकांश जिला पंचायतों में भाजपा समर्थित अध्यक्ष हैं। ऐसे में मौजूदा व्यवस्था के जरिए स्थानीय स्तर पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका बनी रहेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में संगठनात्मक पकड़ बनाए रखने में सत्तारूढ़ दल को लाभ मिल सकता है।
पंचायती व्यवस्था को मजबूती: मानदेय, वेतन और प्रशासनिक खर्च के लिए 1,498 करोड़ रुपये मंजूर।
सरकार का तर्क है कि यदि कार्यकाल समाप्त होने के बाद जिला पंचायतों की जिम्मेदारी पूरी तरह प्रशासनिक अधिकारियों को सौंप दी जाती, तो विकास योजनाओं की गति प्रभावित होने की आशंका रहती। इसी कारण निर्वाचित अध्यक्षों को सीमित अधिकारों के साथ प्रशासक बनाया गया है।
हालांकि इस व्यवस्था को लेकर कानूनी विवाद भी जारी है। ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही सरकार से जवाब मांग चुका है। अदालत ने पूर्व आदेशों के अनुपालन और पंचायत चुनाव में देरी को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। संबंधित मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को प्रस्तावित है। हालांकि जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक बनाए जाने के ताजा निर्णय पर फिलहाल किसी प्रकार की अंतरिम रोक नहीं लगाई गई है।
इस बीच मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने पंचायत चुनाव में देरी के लिए विपक्ष, विशेषकर समाजवादी पार्टी की कानूनी आपत्तियों को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि सरकार समय पर चुनाव कराने के पक्ष में थी, लेकिन न्यायालय में लंबित मामलों के कारण प्रक्रिया प्रभावित हुई।
अब प्रदेश की निगाहें हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के रुख के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सरकार की नई व्यवस्था आगे जारी रहेगी या इसमें किसी प्रकार का बदलाव करना पड़ेगा।
तिरंगे में लिपटकर घर पहुंचे एसएसबी जवान प्रदीप सिंह, राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई।











