लखीमपुर खीरी। विकास के तमाम दावों के बीच निघासन क्षेत्र की ग्राम पंचायत मांझा और भैरमपुर के ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। जौराहा नाले पर स्थायी पुल न होने के कारण ग्रामीण हर वर्ष अपने संसाधनों और श्रम से लकड़ी का अस्थायी पुल तैयार करते हैं। लेकिन मानसून की दस्तक के साथ ही बढ़ते जलस्तर से पुल के बहने का खतरा पैदा हो जाता है, जिसके चलते उसे समय रहते स्वयं ही हटाना पड़ता है।
पुल हटते ही मांझा और भैरमपुर का सिंगाही कस्बे से सीधा संपर्क लगभग पांच महीने के लिए टूट जाता है। इसके बाद ग्रामीणों को नाव के सहारे नदी पार करनी पड़ती है या फिर करीब 18 किलोमीटर लंबा चक्कर लगाकर बेलरायां के रास्ते आना-जाना पड़ता है। जबकि सिंगाही की सीधी दूरी मात्र पांच किलोमीटर है।
ग्रामीणों का कहना है कि पिछले करीब दो दशकों से जौराहा नाले पर स्थायी पुल निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक केवल आश्वासन ही मिले हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में ग्रामीणों ने पुल निर्माण की मांग को लेकर मतदान का बहिष्कार भी किया था, फिर भी समस्या का समाधान नहीं हो सका।ह
आईएएस बने एडीएम नरेंद्र बहादुर सिंह, डीएम खीरी अंजनी कुमार सिंह ने दी बधाई।
र साल गांव के लोग आपस में चंदा एकत्र कर और श्रमदान करके अस्थायी लकड़ी का पुल बनाते हैं। बरसात शुरू होते ही उसे सुरक्षित रखने के लिए उखाड़ना पड़ता है। इससे ग्रामीणों की मेहनत और धन दोनों हर वर्ष व्यर्थ चले जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जौराहा नाले पर स्थायी पुल का निर्माण करा दिया जाए तो मांझा, भैरमपुर सहित आसपास के कई गांवों के हजारों लोगों को पूरे वर्ष सुरक्षित और सुगम आवागमन की सुविधा मिल सकेगी। उनका मानना है कि एक स्थायी पुल केवल रास्ता ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार तक आसान पहुंच का माध्यम भी बनेगा। फिलहाल, एक बार फिर बारिश के मौसम ने इन गांवों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं और लोग नाव के सहारे अपनी दैनिक जरूरतें पूरी करने को विवश हैं।
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