लखनऊ। यूपी में खेती करने वाले गन्ना किसानों के लिए पारंपरिक खेती एक नए जमाने की शुरुआत बनकर सामने आ रही है। तेजतर्रार एवं अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ आयुक्त गन्ना की गई बैठक में पारंपरिक खेती की विशेषता और इसके लाभों पर चर्चा हुई।
उन्होंने बताया कि इंसान द्वारा बनाई गई खादों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से न केवल जमीन की उत्पादक क्षमता घट रही है, बल्कि अन्नदाताओं की लागत भी बढ़ती जा रही है। इसके विपरीत पारंपरिक खेती से क्षमता बनी रहती है। उन्होंने कहा कि हमें खेती के उस आकर को अपनाना होगा जिसमें अन्नदाता स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके बेहतर खेती कर सकें। पारंपरिक खेती के सहारे उत्पादन लागत घटती है, जमीन की स्वास्थ्य सुधरता है और किसान को लाभकारी मूल्य भी मिलता है।
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बिना बाहरी संसाधन की कृषि पद्धति
गन्ना आयुक्त ने बताया कि पारंपरिक खेती एक ऐसी पद्धति है जिसमें किसान को बाजार से खाद खरीदने की आवश्यकता नहीं होती। यह खेती गाय के गोबर, गोमूत्र, नीम, वर्मी कंपोस्ट आदि पर निर्भर होती है, जिससे पैदावार लागत कम और मुनाफा अधिक होता है।
गन्ना किसानों के अनुसार गाय के गोबर और गाय के गोमूत्र से एक पारंपरिक, जैविक तरल उर्वरक तैयार होता है जो पौधों के विकास और मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। इसके उपयोग से रासायनिक खादों पर खर्च पूरी तरह बचता है। इसके अलावा कीट पर संयम के लिए पारंपरिक तरीके अपनाने से उनकी गन्ने के फसलें सुरक्षित रहीं। गन्ना विभाग और योगी सरकार की पहल से अब कई जिलों में किसानों को पारंपरिक खेती का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
























