रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी। उत्तरप्रदेश की राजनीति में वंश परंपरा कोई नई बात नहीं है। प्रदेश में अनेक ऐसे राजनेता रहे हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक अनुभव और जनाधार की विरासत अपने पुत्र-पुत्रियों को सौंपी है। लखीमपुर खीरी जनपद भी इससे अछूता नहीं रहा है, जहां संघर्ष से शिखर तक पहुंचने वाले नेताओं की राजनीतिक विरासत आज नई पीढ़ी संभाल रही है।
जनपद की राजनीति में पूर्व सांसद उषा वर्मा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका राजनीतिक जीवन संघर्ष, सादगी और जनसेवा का उदाहरण रहा। पति बालगोविंद वर्मा के संसदीय कार्यकाल के दौरान ही निधन के बाद उन्होंने स्वयं जनप्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी संभाली और सांसद बनीं।
उषावर्मा ने अपने जीवनकाल में ही अपने इकलौते पुत्र रवि प्रकाश वर्मा को राजनीति की राह पर आगे बढ़ाया। रवि प्रकाश वर्मा न केवल सांसद रहे, बल्कि समाजवादी पार्टी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभा चुके हैं और वर्तमान में कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं। माना जाता है कि जब उनका पुत्र सांसद बना, वह क्षण उषा वर्मा के जीवन का सबसे सुखद अवसर रहा होगा। आज रवि प्रकाश वर्मा अपने माता-पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं और जनपद ही नहीं, प्रदेश स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर, जनपद की राजनीति में जुगुल किशोर का नाम भी प्रभावशाली रहा है। बसपा पार्टी के कार्यकाल में उनका नाम जनपद ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा में रहा। बड़े प्रशासनिक अधिकारी, मंत्री और जनप्रतिनिधि उनसे मुलाकात को महत्वपूर्ण मानते थे। समय की नब्ज पहचानने वाले जुगुल किशोर ने राजनीतिक जीवन में निरंतर सक्रियता बनाए रखी और आज वह प्रदेश भाजपा में प्रवक्ता की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब उनके पुत्र सौरभ सिंह सोनू भारतीय जनता पार्टी से विधायक निर्वाचित हुए। बताया जाता है कि जुगुल किशोर ने संगठन में कार्य करते हुए कभी व्यक्तिगत मांग नहीं रखी, बल्कि परिश्रम और संगठनात्मक निष्ठा के बल पर ही उनके पुत्र को अवसर मिला। आज सौरभ सिंह सोनू जनपद के सबसे कम उम्र के विधायकों में गिने जाते हैं।
खीरी की राजनीति में यह पीढ़ीगत बदलाव इस बात का संकेत है कि यहां राजनीतिक विरासत केवल पद का हस्तांतरण नहीं, बल्कि अनुभव, जनसंपर्क और संगठनात्मक समझ का निरंतर प्रवाह भी है। अब यह समय बताएगा कि नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के बनाए मार्ग पर कितनी दूर तक सफर तय कर पाती है यह समय के गर्भ में है।

























