रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी। तराई के जंगलों से सटे गांवों में तेंदुए की दहशत अब लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ने लगी है। खेतों में काम करने वाले किसान हों, बकरियां चराने निकले बच्चे या घर के आंगन में खेल रहे मासूम—कोई भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा। जनवरी से 14 अक्टूबर तक जिले में तेंदुए के हमलों से सात लोगों की मौत होने की घटनाएं सामने आई हैं। इन घटनाओं ने वन्यजीवों और इंसानी बस्तियों के बीच बढ़ते टकराव को लेकर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि कई हमलों में तेंदुए ने छोटे बच्चों को निशाना बनाया। कुछ घटनाओं में वह बच्चों को घर के आसपास से उठाकर खेतों या झाड़ियों की ओर ले गया। वहीं, महिलाओं पर हमले की घटनाओं ने ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। निघासन क्षेत्र के कई गांवों में लगातार सामने आई इन घटनाओं से ग्रामीणों में भय का माहौल है।
घर के आंगन से खेतों तक मौत का साया
इस साल की शुरुआत एक दर्दनाक घटना से हुई। एक जनवरी को भिड़ौरी ग्राम पंचायत के महाराज नगर गांव के पास चारा लेने गईं ऊषा देवी की खेत में हमले के बाद मौत हो गई। उनका शव रात में मिला था। उस समय हमले को बाघ से जुड़ा बताया गया था, इसलिए इस घटना में हमलावर वन्यजीव की पहचान को अन्य तेंदुए के हमलों से अलग समझना जरूरी है।
घर के बाहर खेल रहे 6 साल के मासूम को उठा ले गया तेंदुआ, जंगल में मिला शव।
25 मार्च को फुटहा फार्म में किसान जोगा सिंह की सात वर्षीय बेटी सिमरन घर में रोटी खा रही थी। इसी दौरान तेंदुआ घर में घुस आया और बच्ची को गर्दन से दबोचकर करीब 200 मीटर दूर खेत में ले गया। परिजनों के शोर मचाने पर वह बच्ची को छोड़कर भाग गया, लेकिन तब तक उसकी जान जा चुकी थी।
18 अप्रैल को निबौरिया गांव के पास गेहूं की कटाई के दौरान चार वर्षीय दिलशाद पर हमला हुआ। तेंदुआ उसे घसीटकर दूर ले गया। ग्रामीणों और पुलिस ने तलाश शुरू की। करीब साढ़े पांच घंटे बाद बच्चे का अधखाया शव झाड़ियों में मिला।
इसके महज एक सप्ताह बाद, 25 अप्रैल को उत्तर निघासन वन रेंज के सहिंजना गांव में संध्यावती की जान चली गई। वह रात में घर के बाहर मच्छरदानी लगाकर सो रही थीं। इसी दौरान तेंदुआ उन्हें करीब 50 मीटर दूर खेत की ओर खींच ले गया। परिजन मौके पर पहुंचे तो तेंदुआ भाग गया, लेकिन महिला को नहीं बचाया जा सका।
जुलाई से अक्टूबर तक भी नहीं थमा हमला
23 जुलाई को बाबागंज निवासी बुद्धा का दस वर्षीय बेटा गोलू बकरियां चराने खेत की ओर जा रहा था। तभी तेंदुए ने उस पर हमला कर दिया और उसे झाड़ियों में घसीट ले गया। बाद में उसका शव गन्ने के खेत में मिला।
अक्टूबर में घटनाओं ने एक बार फिर ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी। 12 अक्टूबर को बोझिया गांव में संपत गिरी की सात वर्षीय बेटी सान्या को तेंदुआ घर से उठा ले गया। अगले दिन सुबह उसका शव घर से करीब 500 मीटर दूर गन्ने के खेत में मिला।
इसके बाद 14 अक्टूबर की शाम उत्तर निघासन वन रेंज के टॉपर फार्म में छह वर्षीय मनजोत सिंह पर हमला हुआ। बच्चा घर के बाहर खेल रहा था। तेंदुआ उसे उठाकर ले गया और करीब 500 मीटर दूर जंगल में उसका अधखाया शव मिला। लगातार सामने आई इन घटनाओं ने ग्रामीणों के मन में भय और असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया है।
आखिर कब सुरक्षित होंगे गांव और उनके बच्चे?
इन घटनाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जंगल से सटे गांवों में रहने वाले लोगों को तेंदुए के हमलों से बचाने के लिए प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था कैसे सुनिश्चित की जाए। बच्चों का घर के बाहर खेलना, महिलाओं का खेतों में काम करना और किसानों का फसलों की देखभाल के लिए निकलना ग्रामीण जीवन का सामान्य हिस्सा है। लेकिन जब इन्हीं गतिविधियों के दौरान जान का खतरा पैदा होने लगे, तो स्थिति की गंभीरता समझी जा सकती है।
जरूरत है कि संवेदनशील गांवों में वन विभाग की निगरानी मजबूत हो, हमले की आशंका वाले इलाकों में ग्रामीणों को समय रहते सतर्क किया जाए और तेंदुए की मौजूदगी की सूचना मिलने पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित हो। बच्चों को अकेले खेतों या झाड़ियों की ओर न जाने देने, अंधेरा होने के बाद अकेले बाहर निकलने से बचने और समूह में आवाजाही करने जैसे एहतियाती उपाय भी जरूरी हैं।
जनवरी से अक्टूबर के बीच हुई सात मौतों का यह सिलसिला केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उन परिवारों का दर्द है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। ग्रामीणों को अब भरोसेमंद सुरक्षा व्यवस्था और वन्यजीवों की आवाजाही पर प्रभावी निगरानी का इंतजार है, ताकि किसी दूसरे घर का आंगन मातम में न बदले।
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