रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखनऊ। यूपी के जनपद सीतापुर जिले में लखनऊ से लगभग 100 से 110 किलोमीटर दूर गोमती नदी के पावन तट पर स्थित नैमिषारण्य न केवल एक तीर्थ, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत धरोहर है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह वही पावन भूमि है, जहाँ 88 हजार ऋषियों ने तपस्या कर ब्रह्मज्ञान की साधना की। कहा जाता है कि यहाँ आकर श्रद्धालु पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति करते हैं। पुराणों और धर्मग्रंथों में वर्णित यह क्षेत्र हजारों वर्षों से आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है।
नैमिषारण्य का हृदय है चक्रतीर्थ, जहाँ एक दिव्य सरोवर स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के चक्र की नेमि इसी स्थान पर गिरी थी, जिसके कारण इस क्षेत्र को नैमिष कहा गया। यही कारण है कि चक्रतीर्थ आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस सरोवर में श्रद्धालु आकर स्नान करते है और मन की शुद्ध करते है।
यहाँ स्थित व्यास गद्दी वह स्थान मानी जाती है, जहाँ महर्षि वेदव्यास ने पुराणों की रचना और उपदेश दिए। वहीं दधीचि कुंड त्याग और बलिदान का प्रतीक है, जहाँ महर्षि दधीचि ने देवताओं के कल्याण हेतु अपनी अस्थियाँ दान कर दी थीं।
धार्मिक कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि सूत मुनि ने सत्यनारायण कथा यहीं ऋषियों को सुनाई थी। साथ ही भगवान राम द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ और उनके पुत्र लव-कुश से भेंट का संबंध भी इसी पवित्र भूमि से जुड़ा हुआ है। यहां स्थित हनुमान गढ़ी अपने आप में भव्यता की प्रतीक है ऐसा लगता है मानो की साक्षात् हनुमान जी के दर्शन हो गए हो। यहां कई मंदिर व कई तरह के स्थल आज भी मौजूद है जिनके दर्शन मात्र से ही जीवन धन्य हो जाता है।
आज भी नैमिषारण्य देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं, संतों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। सड़क, रेल और हवाई मार्ग से यहाँ पहुँचना बेहद आसान है, जिससे यह तीर्थ आधुनिक युग में भी उतना ही सुलभ है।
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