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नेपाल सीमा से तस्करी होकर युवाओं में तेजी से बढ़ रही नशे की लत, युवाओं का भविष्य दांव पर, परिवार हो रहे तबाह।।

By: दीप मिश्रा संपादक

On: Saturday, February 28, 2026 9:02 AM

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रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी। हमारे समाज में नशे को सदा बुराइयों का प्रतीक माना और स्वीकार किया गया है। लेकिन आजकल नशा फैशन बनता जा रहा है। जबकि नशा को सभी बुराइयों का जड़ माना गया है। नशे के सेवन से मानव के विवेक के साथ सोचने समझने की शक्ति भी नष्ट हो जाती है। वह अपने हित अहित और भले-बुरे का अंतर नहीं समझ पाता जिससे मनुष्य के शरीर और बुद्धि के साथ-साथ आत्मा का भी नाश हो जाता है। शराबी अनेक बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। 

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आंकड़ेबताते हैं कि कुछ सालों में नशे के सेवन में काफी इजाफा हुआ है। अमीर से गरीब और बच्चे से बुजुर्ग तक इस लत के शिकार हो रहे हैं। शराब के अतिरिक्त गांजा, अफीम और दूसरी नशीली चीजें भी काफी प्रचलन में हैं। शराब कानूनी रूप से प्रचलित है तो गांजा अफीम आदि प्रतिबंधित होने के बावजूद चलन में है। जनपद लखीमपुर खीरी में बहुत से लोग शराब के नशे के के शिकार हैं। यहाँ तक शराब के साथ लोग भांग-गांजे, अफीम, चिप्पड, ड्रग व इंजेक्सन के जरिये नशे का सेवन करते हैं। एक सर्वे के अनुसार जनपद लखीमपुर खीरी में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 30 प्रतिशत लोग नशे का सेवन करते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल है जिनके घरों में दो जून रोटी भी सुलभ नहीं है। जिन परिवारों के पास रोटी कपड़ा और मकान की सुविधा उपलब्ध नहीं है और सुबह-शाम के खाने के लाले पड़े हुए हैं, उनके मुखिया मजदूरी के रूप में जो कमा कर लाते हैं उसे वे शराब पीने में फूंक डालते हैं। इन लोगों को अपने परिवार की चिंता नहीं है कि उनके पेट खाली हैं और बच्चे भूख से तड़फ रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि वे गम को भुलाने के लिए नशे का सेवन करते हैं। उनका यह तर्क कितना बेमानी है, जब यह देखा जाता है कि उनका परिवार भूखों मर रहा है। एक स्वैच्छिक संगठन की रिपोर्ट में यह जाहिर किया गया है कि कुल पुरुषों की आबादी में से आधे से अधिक आबादी शराब या किसी दूसरी तरह के नशों में अपनी आय का आधे से अधिक पैसा बहा देते हैं। जनपद के कई गांव जो नशे की गिरफ्त में है। जनपद के नेपाल सीमा पार से लगातार नशीले पदार्थों की तस्करी के समाचार सुर्खियों में रहते हैं। 

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जानकारचिंतित हैं कि हरे-भरे लखीमपुर खीरी को इस नशे की लत से कैसे बचाया जाए। हालांकि, नशे का प्रचलन केवल आधुनिक समाज की देन नहीं है, बल्कि प्राचीनकाल में भी इसका सेवन होता था। महाभारत और रामायण काल में मदिरा सेवन के वर्णन मिलते हैं, लेकिन वहां भी इसे एक बुरी वस्तु के रूप में ही इसे चित्रित किया गया है। मदिरा का सेवन आसुरी प्रवृत्ति के लोग ही करते थे और इससे समाज में उस समय भी असुरक्षा, भय और घृणा का वातावरण उत्पन्न होता था। ऐसी आसुरी प्रवृत्ति के लोग मदिरा का सेवन करने के बाद खुले आम बुरे कार्यों को अंजाम देते थे। लखीमपुर खीरी में नशाखोरी में युवावर्ग सर्वाधिक शामिल है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि युवाओं में नशे के बढ़ते चलन के पीछे बदलती जीवन शैली, एकाकी जीवन, बेरोजगारी और आपसी कलह जैसे अनेक कारण हो सकते हैं। इन दिनों शराब की खपत तेजी से बड़ी है। यह सच है कि शराब की बिक्री से सरकार को बड़े राजस्व की प्राप्ति होती है। मगर इस प्रकार की आय से हमारा सामाजिक ढांचा क्षत-विक्षत हो रहा है और परिवार के परिवार खत्म होते जा रहे हैं।फिलहाल लखीमपुर खीरी में इन दिनों बढ़ते नशीले पदार्थों के सेवन से युवा वर्ग का भविष्य खतरे में नजर आ रहा है।

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