लखीमपुर खीरी: जिले के सैदापुर देवकली में स्थित राजकीय रेशम फार्म कीट पालन और रेशम उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग चौबीस एकड़ में फैला यह फार्म अपने आप में बेहद खास है। क्योंकि इस फॉर्म में आपको सिर्फ शहतूत के पेड़ दिखाई देंगे। क्योंकि इस फॉर्म में लगे शहतूत के वृक्ष एक कीट के चारे का कार्य करते है। ये कीट न सिर्फ शहतूत के पौधों के चारे का उत्पादन करता है, बल्कि रेशम कीट पालन की तकनीक और प्रशिक्षण में भी अग्रणी जिम्मेदारी निभा रहा है।
सैदापुर देवकली का यह फॉर्म यूपी सरकार की रेशम उद्योग को बढ़ावा देने की योजनाओं का अहम हिस्सा है। यहां उगाए गए शहतूत के वृक्ष रेशम कीटों के लिए पोषण का प्रमुख स्रोत हैं, जिससे उच्च गुणवत्ता का रेशम प्राप्त किया जाता है।
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जनपद लखीमपुर खीरी में अन्य केंद्र जैसे मितौली, मोहम्मदी, तेंदुआ और मैगलगंज में भी रेशम उत्पादन किया जा रहा है, लेकिन सैदापुर देवकली का यह फार्म सबसे पुराना और अन्य की अपेक्षा बड़ा माना जाता है। इस फॉर्म में किसान रेशम उत्पादन का प्रशिक्षण लेते हैं साथ ही कई लोग इसे रोजगार का प्रमुख साधन भी बना चुके हैं।
रेशम कैसे बनता है?
- शहतूत की पत्तियों से पोषण: रेशम के कीट को शहतूत की पत्तियाँ खिलाई जाती हैं, जो उनकी मुख्य खुराक होती हैं।
- कोया बनाना: जब कीट तैयार हो जाते हैं, तो वे अपने चारों ओर महीन धागे से एक कोया बना लेते हैं। यह धागा ही रेशम होता है।
- कोयों से रेशम निकालना: कोयों को गर्म पानी में डुबोकर या भाप में गर्म करके नरम किया जाता है, जिससे धागा आसानी से निकाला जा सके। इस प्रक्रिया को रीलिंग कहा जाता है।
- धागे की प्रोसेसिंग: निकाले गए रेशम के धागों को साफ कर, रंगकर और बुनाई के लिए तैयार किया जाता है।
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