रिपोर्ट:- शरद मिश्रा
लखीमपुर खीरी: तहसील निघासन क्षेत्र में स्थित दुधवा टाइगर रिजर्व का घना जंगल न केवल जैव विविधता के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए भी विशेष पहचान रखता है। इसी जंगल के बीच विराजमान है काली माता का अत्यंत प्राचीन मंदिर, जो श्रद्धा, आस्था और रहस्यों का अद्भुत संगम माना जाता है।
यह मंदिर जिला मुख्यालय से लगभग 70 से 80 किलोमीटर दूर स्थित है और मान्यता है कि इसका संबंध महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। स्थानीय श्रद्धालुओं और जानकारों के अनुसार, इस मंदिर से जुड़े कई रहस्य आज भी अनसुलझे हैं, जो इसे और अधिक अलौकिक बनाते हैं। भक्तों का विश्वास है कि मां काली के दर्शन मात्र से ही जीवन धन्य हो जाता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि नवरात्रि के पावन दिनों में आज भी माता रानी की सवारी बाघ रात्रि में मंदिर की परिक्रमा करने आता है। यह मान्यता वर्षों से चली आ रही है और श्रद्धालुओं की आस्था को और मजबूत करती है।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि दुधवा टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद आज तक मंदिर परिसर में किसी भी श्रद्धालु पर किसी जंगली जानवर के हमले की कोई घटना सामने नहीं आई है। न ही अब तक यहां किसी प्रकार की अनहोनी हुई है, जिसे लोग मां काली की कृपा और सुरक्षा का प्रतीक मानते हैं।
यही कारण है कि क्षेत्रीय लोग अपने शुभ कार्यों से पहले मां काली के दर्शन के लिए यहां अवश्य आते हैं। विशेष अवसरों पर विशाल भंडारों का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस जंगल को किले का जंगल भी कहा जाता है यहां एक बार पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान एक पत्थर का घोड़ा निकला था जिसे लखनऊ चिड़िया घर के संग्रहालय में रखा गया है जो आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनता है। ऐसे कई और किस्से कहानियां व अनसुलझे रहस्य है जो इस मंदिर को और भी अद्भुत बनाते है।
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